भटगॉवसारंगढ़

आत्महत्या सर्वोपरि पाप है – जीओ और जीने दो

आत्महत्या सर्वोपरि पाप है – जीओ और जीने दो

जीवन एक अनन्त महासागर है, जहाँ लहरें कभी शांत, कभी उग्र। कभी सूरज की किरणें पानी की सतह को चमकाती हैं, तो कभी काले बादल घिर आते हैं और तूफान का कहर सब कुछ निगलने को तैयार हो जाता है। ऐसे ही एक तूफान में फँसा हुआ व्यक्ति, जब थक जाता है, जब उसके हाथ-पैर थरथराने लगते हैं, जब आँखों में आँसू नहीं, अपितु एक सूखी खालीपन की आग जलने लगती है, तब उसके मन में एक विचार उभरता है – एक आखिरी कदम, एक अन्तिम छलाँग। “बस, अब बहुत हो गया।” लेकिन यह छलाँग कोई समाधान नहीं है। यह तो एक भयानक धोखा है, जो दर्द को नहीं मिटाती, बल्कि उसे अपनों के दिलों में अमर कर देती है। आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है, वरन् यह समस्या को और भी गहरा, और भी व्यापक बना देती है। यह एक ऐसी आग है, जो खुद को जलाकर अपनों को भी भस्म कर देती है।

 

यह अभिव्यक्ति उन अनगिनत चीखों का संग्रह है, जो चुपचाप दबी रहती हैं। यह उन हाथों को थामने का प्रयास है, जो रात के अंधेरे में अकेले काँप रहे हैं। यह उस युवा के लिए है, जो परीक्षा की असफलता में डूबा हुआ है; उस माँ के लिए है, जिसका बच्चा बीमार है और इलाज के पैसे नहीं हैं; उस पिता के लिए है, जो नौकरी गँवा चुका है और परिवार का बोझ सह नहीं पा रहा है; उस स्त्री के लिए है, जो घरेलू हिंसा के शिकंजे में जकड़ी हुई है और उस बुजुर्ग के लिए है, जिसे लगता है कि उसका जीवन अब बेकार हो चुका है। यह सकारात्मक विचार है कि आप अकेले नहीं हैं। आपका दर्द असली है, लेकिन आपकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। यह एक हार्दिक आमंत्रण है, जीवन की उस रोशनी की ओर, जो हर अंधेरे के बाद अवश्य निकलती है।

 

एक काल्पनिक हृदयविदारक वेदना से व्यथित व्यक्तित्व की व्यथा-कथा यह है कि एक छोटे से गाँव में रहने वाली एक लड़की ‘अनामिका’ स्कूल में टॉपर, सपने बड़े – डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन परिवार की गरीबी, पिता की बीमारी और समाज की रूढ़िवादी सोच ने उसके पंख काट दिए। रातें नींद से वंचित, दिन चिंता में डूबे। एक शाम, उसने सोचा, “अब क्या फायदाजीने से?” लेकिन उसकी छोटी बहन ने, जो मात्र तीन साल की थी, उसका हाथ पकड़ लिया और कहा – “दीदी, कल स्कूल में मेरे लिए कहानी सुनाओगी न?” वह एक पल था, जो जीवन बदल गया। ‘अनामिका’ आज एक सफल शिक्षिका है और सैकड़ों बच्चों को जीवन की राह दिखाती है। लगभग ऐसी ही अनेकानेक मार्मिक, हृदयस्पर्शी, वास्तविक कहानियाँ आज भी इस विश्व में भरे पड़े हैं। वे सब बताती हैं कि दर्द के अंधेरे में भी उम्मीद की एक किरण होती है, बस उसे पहचानना पड़ता है।

 

आज भारत में आत्महत्या की समस्या एक महामारी बन चुकी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2022 के आंकड़ों के अनुसार, देश में 1,71,000 से अधिक आत्महत्याएँ दर्ज हुईं, जो 2021 की तुलना में 4.2% अधिक हैं। प्रति लाख आबादी पर आत्महत्या दर 12.4 हो चुकी है, जो अब तक की सबसे ऊँची है। रोजाना औसतन 468 लोग इस रास्ते पर चल पड़ते हैं। छात्रों में यह और स्थिति भयावह है – 2022 में 13,044 छात्रों ने आत्महत्या की, जिसमें परीक्षा के दबाव, कोचिंग सेंटर्स की कट्टर प्रतिस्पर्धा और परिवार की अपेक्षाओं का बोझ प्रमुख कारण हैं। कोटा जैसे शहरों में तो यह महामारी का रूप ले चुका है। लेकिन ये सिर्फ आंकड़े नहीं, ये इंसान हैं – सपनों के टूटने के शिकार। लेकिन फिर भी, हम चुप क्यों हैं क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना भारत में अभी भी कलंक है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार 70% से अधिक लोग मानसिक समस्याओं के लिए मदद नहीं माँगते। आखिर क्यों? क्योंकि समाज कहता है – “पागल मत बनो” , “सब ठीक हो जाएगा”, “मर्द को रोना नहीं चाहिए” , “लड़कियों को घर संम्भालना चाहिए”।

 

सांस्कृतिक रूप से, हम अवसाद को कमजोरी मानते हैं, भूत-प्रेत का प्रभाव या पिछले जन्मों का फल। परिवार की इज्जत, समाज की नजर, रिश्तेदारों की बातें – ये सब दर्द को और गहरा कर देते हैं। लेकिन फिर भी सच्चाई यह है कि अवसाद, चिंता, नकारात्मक सोच – ये भयानक गम्भीर बीमारियाँ हैं, जैसी कि डायबिटीज, किडनी, हृदय रोग आदि। तन-मन-मस्तिष्क-चेतना विषयान्तर्गत सुखानन्द, सकारात्मक सोच-विचार सम्बन्धी रसायनों का असंतुलन, आनुवांशिक कारक, बचपन का शारीरिक या मानसिक चोट, गम्भीर आघात या सदमा, आर्थिक तंगी, रिश्तों की जटिलताएँ – ये सब वैज्ञानिक तथ्य हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में हर साल 07 लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं और भारत इसका बहुत बड़ा हिस्सेदार है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि 90% से अधिक मामलों में समय पर हस्तक्षेप से बचाव सम्भव है।

 

मनोवैज्ञानिक कहते हैं, “सुसाइडल थॉट्स टेम्पररी हैं, लेकिन उनके प्रभाव परमानेन्ट”। एक पल में लगता है कि दुनिया खत्म हो गई, लेकिन अगले पल कोई फोन कॉल, कोई दोस्त का मैसेज, कोई पुरानी याद – सब बदल देता है। जीवन अनगिनत पलों का मेल है। स्मरण कीजिए, बचपन की वो पहली साइकिल, पहला प्यार, पहली सफलता की खुशी। वो छोटी-छोटी चीजें – सुबह की चाय, बारिश की बूँदें, दोस्त का हँसना, माँ का आलिंगन – ये सब जीवन के उपहार हैं। आत्महत्या इन सब को छीन लेती है, न सिर्फ खुद से, बल्कि अपनों से भी। माता-पिता की अपेक्षाएँ बच्चों को तोड़ देती हैं। भारत में, जहां शिक्षा को मुक्ति का रास्ता माना जाता है, वहाँ परीक्षाओं ने लाखों युवाओं को मानसिक रोगी बना दिया है। लेकिन समाधान भी है – संवाद, समझ, और व्यवसायिक सहयोग।

 

एक अध्ययन के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति अपनी समस्या किसी से शेयर करे, तो आत्महत्या का जोखिम 50% कम हो जाता है। भारत की विविधता में, हर क्षेत्र की अपनी चुनौतियाँ हैं। उत्तर में किसानों की आत्महत्या, दक्षिण में छात्रों की, पूर्व में महिलाओं की घरेलू समस्याएँ, पश्चिम में युवाओं की कैरियर प्रेशर। लेकिन एक बात सब में समान है – सहारा की आवश्यकता। अपने आप को पहचानें – दर्द का नाम दें – अवसाद, चिंता। बोलें – किसी विश्वसनीय व्यक्ति से शेयर करें। सहयोग लें – व्यवसायिक सलाहकार से मिलें। रूटीन बनाएँ – व्यायाम, स्वस्थ भोजन, नींद। समुदाय से जुड़ें – सपोर्ट ग्रुप्स में शामिल हों। यह अभिव्यक्ति केवल विचारों का संग्रह नहीं, अपितु एक क्रांति है। यह कहती है कि जीवन एक उपहार है और इसका कोई विकल्प नहीं। आत्महत्या से बचकर हम न सिर्फ खुद को बचाते हैं, बल्कि अपनों को भी। क्योंकि जब कोई चला जाता है, तो पीछे रहने वाले कभी ठीक नहीं होते। माता-पिता की आँखें सूख जाती हैं, भाई-बहन का विश्वास टूट जाता है, मित्रों का दिल टूट जाता है। लेकिन जीने से, हम कहानी को आगे बढ़ाते हैं।

 

जियो और जीने दो , क्योंकि हमारा प्रत्येक साँस परम ब्रह्म की अमानत है। हमारे बिना यह दुनिया अधूरी है। हमारे सपने, हमारी हँसी, हमारी वो छोटी-छोटी आदतें – सब कुछ अनमोल हैं। यदि आज रात लगे कि अंधेरा घना है, तो याद रखो, सूरज निकलेगा। यदि दर्द असहनीय हो, तो सहयोग माँगो। चीखो-चिल्लाओ, रोओ-गाओ, लेकिन रुको मत, आगे बढ़ो। यह सकारात्मक सोच हमें सिखाता है कि जीवन की प्रत्येक राह पर, प्रत्येक मोड़ पर सहयोगी हैं – परिवार, मित्र, समाज और सबसे ऊपर स्वयं हम – आप। निर्विवाद रूप से सहयोगी सुझाव देंगे – “रुको, देखो, आगे क्या है।” क्योंकि प्रत्येक अन्त एक नवीन श्रीगणेश है। जियो और जीने दो, क्योंकि हमें जीना है, जीनेवाला बनना है। हमारी कहानी अभी लिखी जा रही है और यह निःसंदेह अपेक्षाकृत मनभावन होगी।

 

– डॉ. गौतम सिंह पटेल ‘सालर’ सारंगढ़- बिलाईगढ़, छत्तीसगढ़.

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