
नए दौर में योग, प्राणायाम और जीवन का नव-निर्माण

(नत्थूलाल केड़िया, वरिष्ठ पत्रकार)
सारंगढ़। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, मानसिक तनाव और कोरोना काल के बाद बदले सामाजिक परिवेश में हर व्यक्ति शांति और अच्छे स्वास्थ्य की तलाश में है। लेकिन हम अक्सर स्वास्थ्य को केवल बाहरी शरीर से जोड़कर देखते हैं। वास्तव में, संपूर्ण स्वास्थ्य का मार्ग हमारे भीतर से होकर गुजरता है। योग का वास्तविक अर्थ ही ‘जोड़’ है— यह शरीर, मन और आत्मा का वह सुंदर संतुलन है, जो जीव को शिव से, यानी आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है।
जब हम प्राणायाम की बात करते हैं, तो यह केवल सांस लेना और छोड़ना नहीं, बल्कि ‘प्राणों का आयाम’ यानी सांसों का नियमन है। हमारी श्वास ही हमारा प्राण है, और इस पर नियंत्रण पाकर हम अपने जीवन को नियंत्रित कर सकते हैं। ऋषि- मुनियों की इस अनमोल विद्या में सात मुख्य प्राणायामों का विधान है, जो आज के समय में संजीवनी से कम नहीं है।

भस्त्रिका प्राणायाम: शरीर में नई ऊर्जा और ऑक्सीजन का संचार करता है।
कपालभाति प्राणायाम: ‘कपाल’ अर्थात माथा और ‘भाति’ अर्थात चमक। यह केवल पेट की कसरत नहीं, बल्कि घंटों की साधना से चेहरे और जीवन में तेज (ओज) लाने वाली विधा है। दैनिक जीवन में इसके कुछ ही स्ट्रोक्स शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को चमत्कारी रूप से बढ़ा देते हैं।
अनुलोम-विलोम (नाड़ी शोधन): शरीर की समस्त नसों को शुद्ध कर मानसिक एकाग्रता बढ़ाता है।
उज्जायी प्राणायाम: गले के विकारों और थायराइड जैसी समस्याओं के लिए अचूक औषधि है।
भ्रामरी प्राणायाम: आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी समस्या—माइग्रेन, अवसाद और सिरदर्द से मुक्ति का दिव्य साधन है।
उद्गीत प्राणायाम: गहरी सांस भरकर पवित्र ‘ॐ’ ध्वनि का उच्चारण मात्र ही अंतरात्मा को असीम शांति से भर देता है।
ध्यान प्राणायाम: खाली पेट, शांत मुद्रा में बैठकर केवल अपनी आती-जाती सांसों के प्रति सजग हो जाना ही ध्यान है, जो मन को शून्य और स्थिर करता है।
प्राणायाम के साथ-साथ छोटे और सरल आसनों का हमारे दैनिक जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। उदाहरण के लिए, ‘भद्रासन या तितली आसन’ मात्र पांच मिनट रोज करने से घुटने मजबूत होते हैं, एड़ी-पंजे का दर्द दूर होता है और नाभि के निचले हिस्से के समस्त रोग, जैसे प्रोस्टेट, यूरिन इन्फेक्शन या साइटिका के दर्द में अचूक लाभ मिलता है। इसी तरह गैस की समस्या के लिए ‘पवनमुक्तासन’, कमर दर्द के लिए ‘मरकटासन’ और रीढ़ की हड्डी को लचीला व फिट रखने के लिए ‘भुजंगासन’ अद्भुत हैं।
*अंतस यात्रा*
एक पुराना पत्रकार होने के नाते, मैंने जीवन को बहुत करीब से देखा है। आज जब मुझे ‘आशा निकेतन वृद्धाश्रम’ में बुजुर्गों के बीच निशुल्क सेवा की जवाबदेही मिली है, तो मैंने इसे अपना परम धर्म बना लिया है। प्रतिदिन सुबह 7 बजे से 8 बजे तक, मौसम चाहे कैसा भी हो, पानी गिरे या ठंड हो, मेरा वहां निर्धारित समय पर जाना सुनिश्चित रहता है।
वहां का वातावरण बहुत ही दिव्य और ऊर्जावान होता है। योग की शारीरिक क्रियाएं और मंत्रों की सकारात्मक ऊर्जा मिलकर एक अद्भुत तालमेल बनाती हैं। जब जीवन के इस पड़ाव पर पहुंचे बुजुर्ग दोनों हाथ उठाकर पूरी श्रद्धा से विजय मंत्र का जाप करते हैं और हल्के-फुल्के व्यायाम करते हैं, तो उनकी आँखों में जो चमक और चेहरे पर जो ओज दिखता है, वह अलौकिक है। यह केवल एक व्यायाम सत्र नहीं, बल्कि स्वस्थ और आनंदमय जीवन जीने की एक सुंदर कला है। इस सेवा से आश्रम के बुजुर्गों को स्वास्थ्य लाभ तो मिल ही रहा है, लेकिन सच कहूँ तो एक साधक और पत्रकार के रूप में मुझे स्वयं इससे एक नया जीवन, नई ऊर्जा और असीम आत्मिक शांति मिली है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी इस सनातनी धरोहर को पहचानें और जीवन के हर पड़ाव पर योग को अपनाएं, क्यों कि स्वस्थ नागरिक से ही एक स्वस्थ और खुशहाल समाज का निर्माण संभव है।




