नगर भटगांव में महिलाओं ने वट सावित्री की पूजा बहुत हर्षोल्लास के साथ श्रद्धा पूर्वक की
महिलाओं ने निर्जला व्रत रखकर अपने पति के दीर्घायु जीवन लिए की वट सावित्री की पूजा
नगर भटगांव में महिलाओं ने वट सावित्री की पूजा बहुत हर्षोल्लास के साथ श्रद्धा पूर्वक की
महिलाओं ने निर्जला व्रत रखकर अपने पति के दीर्घायु जीवन लिए की वट सावित्री की पूजा

भटगांव- नगर भटगांव में वट सावित्री की पूजा के लिए नगर के सभी माता बहिनों नें सुबह से ही राम मंदिर ,शनिदेव , शीतला चौक , राजा पारा, सेठ तालाब मंदिर एवं नगर के विभिन्न जगहों में वट सावित्री की पूजा श्रद्धा पूर्वक धूमधाम के साथ किया.

वट सावित्री व्रत की कथा पतिव्रता सावित्री की अमर प्रेम कहानी है, जिन्होंने अपने दृढ़ संकल्प और भक्ति के बल पर यमराज से अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस छीन लिए थे। यह व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए रखा जाता है。वट सावित्री व्रत की संपूर्ण कथा राजकुमारी सावित्री का जन्म और विवाह:प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने देवी सावित्री की कठोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक तेजस्वी कन्या की प्राप्ति हुई और कन्या का नाम सावित्री रखा गया। बड़ी होने पर सावित्री ने सत्यवान को अपना पति चुना। सत्यवान साल्व देश के निर्वासित राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे, जिनका राज्य छिन गया था और वे जंगल में एक कुटिया में रहते थे.

ऋषि का श्राप और भविष्यवाणी:जब सावित्री ने सत्यवान से विवाह करने का निर्णय लिया, तो देवर्षि नारद ने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान बहुत गुणी और धर्मात्मा हैं, लेकिन उनकी आयु बहुत कम है। विवाह के ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। अपने पिता के आग्रह के बावजूद, सावित्री अपने फैसले से नहीं डिगी और उन्होंने सत्यवान के साथ ही विवाह किया。सत्यवान की मृत्यु और यमराज का आगमन:विवाह के बाद सावित्री एक आदर्श पत्नी की तरह अपने पति और अंधे सास-ससुर की सेवा करने लगीं। नारद मुनि द्वारा बताई गई तिथि के दिन जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काट रहे थे, तब उनके सिर में अचानक तेज दर्द हुआ और वे जमीन पर गिर पड़े। कुछ ही समय में यमराज (मृत्यु के देवता) उनके प्राण लेने के लिए आ पहुंचे।



सावित्री ने बिना घबराए यमराज का अनुसरण किया。सावित्री की चतुराई और वरदान:यमराज सावित्री के पतिव्रता धर्म और निष्ठा से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने सावित्री को पति के प्राणों के अलावा कोई भी तीन वरदान मांगने को कहा:पहला वरदान: सावित्री ने अपने अंधे ससुर के खोए हुए राज्य और उनकी दृष्टि वापस मांगी।दूसरा वरदान: उन्होंने अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा।तीसरा वरदान: उन्होंने स्वयं के लिए सत्यवान के सौ पुत्रों की माँ बनने की प्रार्थना की.

सत्यवान के प्राणों की वापसी:तीसरे वरदान को पूरा करने के लिए यमराज को बाध्य होकर सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े। यमराज ने सावित्री के पतिव्रता धर्म को नमन किया और उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया। सावित्री वापस उसी वट वृक्ष (बरगद) के पास लौटीं और सत्यवान जीवित हो उठे। यमराज के वरदान से सत्यवान का खोया हुआ राज्य और उनके माता-पिता की दृष्टि भी लौट आई。पूजा का महत्वमान्यता है कि इसी घटना के बाद से सुहागिनें वट वृक्ष की पूजा करती हैं। बरगद के पेड़ में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का वास माना जाता है। इस पेड़ की जड़ों में जल चढ़ाने, परिक्रमा करने और कच्चा धागा लपेटकर कथा सुनने से पति को लंबी आयु और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है ।








