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ED छापेमारी की चर्चा बंगाल से महाराष्ट्र तक,जानें प्रवर्तन निदेशालय का इतिहास, ताकत और अधिकार

31 जुलाई 2022  : बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक देश में कई जगह ईडी की कार्रवाई चल रही है. ताजा मामला शिवसेना नेता संजय राउत  का है जिनपर पात्रा चॉल घोटाले मामले को लेकर ईडी की कार्रवाई चल रही है. वहीं बंगाल के बर्खास्त मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी को गिरफ्तार कर स्कूल भर्ती घोटाला मामले में पूछताछ की जा रही है. विपक्षी दल कांग्रेस नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी से ईडी की पूछताछ का विरोध कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग का कानून में ईडी की सभी अधिकारों को बरकरार रखा है. ऐसे में आइये जानते हैं कि आखिर क्या है प्रवर्तन निदेशालय, इसका इतिहास क्या है, यह कैसे काम करता है और इसके क्या अधिकार हैं.

ED भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग में आने वाली संस्था है. इसका मुख्यालय दिल्ली में है, साथ ही देश के अलग-अलग शहरों में इसके जोनल ऑफिस हैं. ईडी में भारतीय राजस्व सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी तैनात किए जाते हैं.

ED का इतिहास

देश जब ब्रिटिश शासन से आजाद हुआ तब 1947 में फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट बना था. इसे वित्त मंत्रालय का डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक अफेयर्स देखता था. 1956 में प्रवर्तन इकाई बनी. इसी में इकोनॉमिक अफेयर्स डिपार्टमेंट बना. 1957 में इसका नाम बदलकर डायरेक्टोरेट ऑफ एनफोर्समेंट या एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट रखा गया जिसे ईडी कहते हैं. 1960 में इसे रिवेन्यू डिपार्टमेंट में शिफ्ट कर दिया गया और तब से यह उसी में काम कर रहा है.

1973 में 1947 के फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट में संशोधन हुआ और नया एक्ट आया. 90 के दशक में देश की अर्थव्यवस्था ऊपर गई. काफी मात्रा में फॉरेन एक्सचेंज आया तब रेगुलेशन के बजाय मैनेजमेंट की जरूरत हुई. तब एक्ट को बदलकर फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट 1991 कर दिया गया. प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट जब बना तो सरकार ने तय किया कि इसका एनफोर्समेंट ईडी करेगी. इसमें काफी लोग बाहर से भी तैनात किए जाते हैं. काफी लोग डेप्यूटेशन पर भी आते हैं. 2018 जब सरकार ने देखा कि आर्थिक अपराधी काफी संख्या में देश से बाहर भाग रहे हैं तो फ्यूजिटिव ऑफेंडर एक्ट लाया गया. इसे ईडी के अंतर्गत रखा गया.

इन कानूनों के अंतर्गत काम करती है ईडी

ईडी मुख्यतौर पर तीन कानूनों के अंतर्गत काम करती है. विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम 1999 (FEMA. धन सोधन निवारण अधिनियम 2002 (PMLA). भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम 2018 (FEOA). FEMA के अंतर्गत ईडी फॉरेन एक्सचेंज में वायलेशन में जांच करता है. PMLA को मनीलॉन्ड्रिंग को रोकने या मामले में शामिल अवैध संपत्ति को जब्त करने के लिए बनाया गया. FEOA को आर्थिक अपराधियों को भारत से भागने से रोकने के लिए बनाया गया है.

ईडी के अधिकार

सीबीआई केंद्र, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से आदेश मिलने पर सीबीआई जांच करती है, इसके अलावा राज्य के मामले में राज्य सरकार की अनुमति जरूरी होती है लेकिन ईडी के मामले में ऐसा नहीं है. किसी थाने में एक करोड़ रुपये या उससे ज्यादा की हेराफेरी का मामला दर्ज होने पर पुलिस ईडी को इसकी जानकारी देती है. इसके बाद ईडी थाने से एफआईआर या चार्जशीट की कॉपी लेकर जांच शुरू कर सकती है. ईडी को अगर पुलिस पहले मामले की जानकारी लग जाती है, तब भी वह जांच शुरू कर सकती है.

ईडी फेमा उल्लंघन, हवाला लेनदेन, फॉरेन एक्सचेंज वायलेशन, विदेश में किसी भी संपत्ति पर कार्रवाई और विदेश में संपत्ति की खरीद के मामलों में जांच करती है. एजेंसी के पास मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपियों के खिलाफ जब्ती और गिरफ्तारी के अधिकार हैं. ईडी वित्तीय रूप से किए गए गैरकानूनी कामों पर कार्रवाई का अधिकार रखती है. पीएमएलए के तहत ईडी को संपत्ति जब्त करने, छापा मारने और गिरफ्तारी का अधिकार मिला है. ईडी की ताकत अंदाजा इससे भी लगा सकते हैं कि एजेंसी पूछताछ के बिना भी संपत्ति जब्त कर सकती है. गिरफ्तारी के समय ईडी कारण बता भी सकती है, नहीं भी बता सकती है. इसके एक जांच अधिकारी के सामने भी दिया गया बयान कोर्ट में सबूत माना जाता है.

ईडी की गिरफ्तारी में जमानत मिलना मुश्किल होता है. फेमा और पीएमएलए मामलों में ईडी तीन साल तक आरोपी की जमानत रोक सकती है. ईडी भगोड़े अपराधियों की संपत्ति कुर्क कर सकती है और केंद्र सरकार से अटैच कर सकती है. भगोड़े के प्रत्यर्पण में कठिनाई को देखते हुए उसकी पूरी संपत्ति को अटैच करने का अधिकार ईडी को दिया गया है. ईडी एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट की बड़ी आर्थिक धोखाधड़ी के मामले भी देखती है. अगर किसी ने भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा अपने पास रखी या विदेशी मुद्रा का अवैध व्यापार किया है तो इसकी जांच भी ईडी करती है.

क्या है मनी लॉन्ड्रिंग?

ईडी के पूर्व निदेशक कर्नल सिंह के अनुसार, प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट में तीन शेड्यूल हैं. इन्हें शेड्यूल ए, बी और सी बोला जाता है. इनमें तीस एक्ट हैं, जिनमें 160 सेक्शन हैं. इन्हें शेड्यूल ऑफेंसेज या प्रेडिकेट ऑफेंसेज कहा जाता है. जब इन शेड्यूल ऑफेंस के ऊपर पुलिस, सीबीआई, एनआईए, इनकम टैक्स विभाग, कस्टम विभाग आदि में जांच शुरू होती है तो बाद में इसे ईडी देखती है. लोग जब गैर कानूनी तरीके से कमाए धन को सफेद करने की कोशिश करते हैं, उसे वैध बनाने की कोशिश करते हैं तब इस प्रकिया को मनी लॉन्ड्रिंग कहा जाता है. ईडी यह देखती है कि आरोपी ने धन को कैसे बदला. इसे जांचने के बाद संपत्ति को अटैच किया जाता है. अटैचमेंट ठीक पाए जाने पर ईडी की जांच आगे बढ़ जाती है. मनीलॉन्ड्रिंग के मामले में सात से 10 साल तक की कैद या कैद और जुर्माना दोनों लगाया जा सकता है.

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