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जर्नलिस्ट कप्पन को बेल मिली, रिहाई नहीं:भाई बोले- 45 हजार के लिए मनी लॉन्ड्रिंग का केस, क्या इतने में कोई दंगा भड़का सकता है

इस कमेंट के साथ सुप्रीम कोर्ट ने 9 सितंबर को जर्नलिस्ट सिद्दीक कप्‍पन को जमानत दे दी थी। कप्पन 5 अक्टूबर 2020 से जेल में हैं। उन पर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से कनेक्शन, दंगा भड़काने, मनी लॉन्ड्रिंग और गैरकानूनी तरीके से पैसा जमा करने के आरोप हैं।

कप्पन को जमानत मिले 11 दिन हो गए, लेकिन वे अब भी जेल में बंद हैं। वजह है दो जमानतदारों का न मिलना। एक-एक लाख के दो बॉन्ड भरना है, उसका भी इंतजाम नहीं है। गिरफ्तारी के वक्त कप्पन के पास 45 हजार रुपए मिले थे। इस पर उनके भाई हमजा पूछते हैं कि क्या इतने पैसों में कोई दंगा भड़का सकता है।

दो साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहा परिवार
कप्पन के भाई हमजा और पत्नी रैहानाथ ही दो साल से उनके लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। कप्पन का घर मलप्पुरम जिले के पूचोलामद गांव में है। मलप्पुरम से करीब 14 किमी दूर बसा ये गांव काफी समृद्ध है। यहां के 70% से ज्यादा युवा खाड़ी देशों में काम करते हैं।

हम कप्पन के परिवार से मिलने उनके घर पहुंचे। उनकी पत्नी रैहानाथ दो बेटों 18 साल के मुजम्मिल, 14 साल के जिदान और 10 साल की बेटी मेहनाज के साथ रहती हैं। कप्पन की मां का पिछले साल फरवरी में निधन हो गया था। तभी कप्पन 5 दिन के लिए जमानत पर जेल से बाहर आए थे।

पत्नी ने माना- PFI के अखबार में काम करते थे कप्पन
कप्पन की पत्नी रैहानाथ सिर्फ मलयालम भाषा जानती हैं। इसलिए उन्होंने उनके भाई हमजा कप्पन को हमसे बात करने के लिए बुलाया। 50 साल के हमजा कप्पन की गिरफ्तारी के बाद से लगातार UP जा रहे हैं। इस वजह से वे हिंदी समझने लगे हैं।

हमने रैहानाथ से पूछा- पति के जेल में रहते बीते दो साल कितने मुश्किल रहे? उन्होंने जवाब दिया- इसे कुछ मिनटों में नहीं बताया जा सकता। जब उन्हें गिरफ्तार किया गया, तब मां बीमार थीं। अब वे नहीं रहीं। तब घर बन रहा था, वह अब तैयार तो हो गया लेकिन कुछ काम बाकी है।

कप्पन के जाने के बाद तीन बच्चों की देखभाल के साथ कानूनी लड़ाई का भी जिम्मा था। समझ नहीं आता था कि किसके आगे जाकर हाथ फैलाऊं। तब भी मुझे एक बात पता थी कि कप्पन ने कुछ गलत नहीं किया। एक दिन यह सच्चाई सबके सामने आएगी।

कप्पन कभी किसी संगठन या पार्टी से नहीं जुड़े
हमने पूछा- क्या आपके पति PFI से जुड़े थे, जैसा उन पर आरोप लगा है? इस पर रैहानाथ ने माना कि उनके पति PFI के पेपर ‘तेजस’ में बतौर जर्नलिस्ट काम करते थे। ये पेपर मलयालम भाषा में आता है। रैहानाथ ने कहा कि किसी संगठन से जुड़े पेपर में काम करने का यह मतलब नहीं हो जाता कि कप्पन भी उस संगठन से जुड़े थे।

वे कभी PFI के मेंबर नहीं रहे। उनकी तरह अखबार में 380 लोग और काम करते थे। इसका मतलब यह नहीं है कि वे सभी PFI के मेंबर हैं। वहां अलग-अलग विचारधारा और धर्मों के लोग काम करते थे। कप्पन कभी किसी संगठन, विचारधारा या पार्टी से नहीं जुड़े।

तेजस में काम करने के दौरान कप्पन के एडिटर और मैनेजिंग एडिटर के साथ अच्छे रिश्ते थे। जाहिर है कि उनके PFI के लोगों से भी संबंध होंगे। इसके बावजूद उन्हें PFI का मेंबर नहीं कहा जा सकता। तेजस के बाद उन्होंने थलसामयम न्यूज पेपर में काम किया। यह अखबार एक साल में बंद हो गया। उनकी 7 महीने की सैलरी अब भी पेंडिंग हैं। इसके बाद दिल्ली में मलयालम न्यूज पोर्टल अजीमुगम में नौकरी मिल गई। हाथरस जाते समय वह अजीमुगम के लिए ही काम कर रहे थे।

भाई का सवाल- क्या कोई 45 हजार रुपए में दंगे फैला सकता है
गिरफ्तारी के वक्त कप्पन के अकाउंट में 45 हजार रुपए मिले थे। इसका हिसाब न देने पर उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया गया था। इस पर भाई हमजा कप्पन कहते हैं कि 45 हजार रुपए किसी भी व्यक्ति के पास आसानी से मिल जाएंगे। अगर ऐसा कुछ होता तो जांच एजेंसी के पास सबूत होते। सिर्फ 45 हजार रुपए से वह क्या दंगा फैला सकते थे?

हमने पूछा कि कप्पन की रिहाई में क्या परेशानी है? इस पर हमजा ने कहा कि हमें दो जमानतदार चाहिए, जो अब तक नहीं मिले हैं। इसके अलावा एक-एक लाख के दो बॉन्ड भरने हैं। इसका भी इंतजाम नहीं हुआ है। केरल से दो लोगों को लेकर मैं UP गया था, लेकिन अदालत ने उन्हें नहीं माना। राहुल गांधी एक बार वायनाड आए थे, तो हम उनसे मिले थे। कई नेताओं से बात की, उन्होंने मदद का भरोसा भी दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

जेल में कप्पन की हालत बिगड़ी, इलाज के लिए भी कोर्ट जाना पड़ा
कप्पन को शुगर और कोलेस्ट्रॉल की समस्या है। जेल में रहते हुए ही उन्हें कोरोना हो गया। पत्नी और बेटा उनसे मिलने गए तो देखा कि बेड़ियों में जकड़कर उनका इलाज किया जा रहा था। परिवार उन्हें एम्स में एडमिट करवाने के लिए कोर्ट गया।

रैहानाथ ने बताया कि जेल में गिरने की वजह से उनके दांत टूट गए। इसके बावजूद जेल अधिकारी कहते रहे कि उनकी हालत ठीक है। इलाज पूरा किए बिना उन्हें मदुरै जेल ट्रांसफर कर दिया गया। यहां उन्हें इलाज मिला। किताबें पढ़ने की इजाजत दे दी गई। इसके बाद NIA कोर्ट के आदेश पर उन्हें फिर लखनऊ जेल भेज दिया गया। इस दौरान करीब एक महीने तक उनके बारे में कुछ पता नहीं चला। हमने इंटरनेट पर सर्च किया। दोनों जेलों के अफसरों से बात की, तब जानकारी मिली।

हफ्ते में 5 मिनट बातचीत की इजाजत
लखनऊ शिफ्ट किए जाने के एक महीने बाद कप्पन का फोन आया। जेल अधिकारियों ने अपने सामने बैठकर कप्पन को रैहानाथ से हिंदी में बात करने को कहा। रैहानाथ को हिंदी नहीं आती। इसलिए ट्रांसलेटर की मदद लेनी पड़ी। वे इस मुद्दे को कोर्ट में ले गए। कोर्ट के आदेश के बाद कप्पन परिवार से मलयालम में बात कर सकते हैं। सप्ताह में एक बार 5 मिनट बातचीत की इजाजत है।

घर से भेजी दवाएं कप्पन को नहीं दी गईं
रैहानाथ ने बताया कि कप्पन का हर तीन महीने पर शुगर टेस्ट कराया जाता है। मैंने वकील के जरिए दवाएं भेजी थीं, लेकिन जेल प्रशासन ने दवा उन तक नहीं पहुंचाई। शुरू के 45 दिन हमें नहीं पता था कि वे जिंदा हैं भी या नहीं। कोर्ट में हैबिस कॉर्पस दायर करने के बाद हमें उनके बारे में पता चला। जेल भेजने से पहले उन्हें एक स्कूल में रखा गया था। इस कमरे में करीब 500 लोग रहते थे। लखनऊ जेल में उन्हें जिस बैरक में रखा गया, वहां 150 लोगों के बीच सिर्फ एक बाथरूम है।

दो साल में कई बार परिवार से पूछताछ
परिवार के मुताबिक, गिरफ्तारी से पहले कप्पन एक इंटरव्यू के लिए दिल्ली गए थे। डेढ़ महीने बाद परिवार को पता चला कि उन्हें अरेस्ट कर लिया गया है। कप्पन की गिरफ्तारी के बाद कई बार जांच एजेंसियों के लोग उनके घर पूछताछ के लिए आ चुके हैं। घर की तलाशी भी ली गई, लेकिन कुछ नहीं मिला। केरल पुलिस के अधिकारी भी परिवार से पूछताछ कर चुके हैं।

कंप्यूटर इंजीनियर थे कप्पन, दुबई में भी काम किया
42 साल के कप्पन पर अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन ऐक्‍ट (UAPA) के तहत केस दर्ज है। गलत तरीके से पैसे जमा करने और दंगे की साजिश रचने के भी आरोप हैं। जर्नलिस्ट बनने से पहले कप्पन कंप्यूटर इंजीनियर थे। 9 साल दुबई में रहे।

2011 में पिता के निधन के बाद वे घर आ गए। परिवार चलाने के लिए पत्रकारिता का पेशा चुना। कुछ दिनों तक मलयालम डेली ‘तेजस’ में काम करने के बाद उन्हें दिल्ली ब्यूरो में भेज दिया गया।

दंगे करने के लिए मिले 1.36 करोड़ रुपए
जांच में पता चला कि रउफ ने खाड़ी देशों से 1.36 करोड़ रुपए अलग-अलग तरीकों से मंगवाए थे। चारों आरोपियों के हाथरस जाने और वहां माहौल खराब करने के लिए भी इन पैसों का इस्तेमाल किया जा रहा था।

आरोप है PFI दिल्ली में नागरिकता कानून के विरोध में प्रदर्शन और फरवरी 2020 में हुए दंगों के लिए इसी पैसों का इस्तेमाल कर चुका था। दिल्ली पुलिस ने भी दंगों में PFI के मोहम्मद दानिश को गिरफ्तार किया था। PFI के पास करीब 100 करोड़ रुपए आए थे। इसमें से काफी रकम नकद जमा की गई, यानी पैसे किसने दिए इसकी जानकारी नहीं है।

कप्पन के 36 आर्टिकल पर सवाल
यूपी पुलिस ने कप्पन के खिलाफ 5000 हजार पन्नों की चार्जशीट दायर की थी। इसमें दावा किया गया कि कप्पन ने 36 आर्टिकल लिखे, जिसमें एक धर्म को टारगेट किया गया। जिन सब्जेक्ट पर कप्पन ने सबसे ज्यादा फोकस किया उनमें फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगे, वकील प्रशांत भूषण का इंटरव्यू, असम में NRC एक्ट, उर्दू मलयाली कवि सैयद मोहम्मद सरवर और जेल में बंद प्रोफेसर जी एन साईबाबा शामिल हैं।

पुलिस ने कहा था- शाम तक छोड़ देंगे
कप्पन केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (KUWJ) के सेक्रेटरी थे। KUWJ के उपाध्यक्ष प्रशांत एम ने बताया कि 5 अक्टूबर 2020 की दोपहर 2 बजे कप्पन को अरेस्ट किया गया। शाम 5 बजे हमें इसकी जानकारी हुई। हमने यूनियन की ओर से मथुरा पुलिस के अधिकारियों से बात की। बताया कि कप्पन जर्नलिस्ट हैं और कवरेज के लिए हाथरस जा रहे थे। इसके बाद मथुरा के एक अधिकारी ने कहा कि वे शाम तक कप्पन को छोड़ देंगे, लेकिन अगले दिन हमने उन्हें फिर फोन किया तो उन्होंने कप्पन को छोड़ने से इनकार कर दिया।

हमने कप्पन की रिहाई के लिए कोशिश शुरू की। कपिल सिब्बल से मुलाकात की और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें तकरीबन 45 दिन लग गए। डेढ़ महीने बाद हमें पता चला कि कप्पन लखनऊ जेल में हैं।

वे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के भी सदस्य हैं। मलयालम न्यूज पोर्टल के लिए रिपोर्टिंग कर रहे थे। वे कुछ पत्रकारों के साथ हाथरस जाने वाले थे, लेकिन ज्यादातर पहले ही वहां पहुंच चुके थे। उन्हें जल्दी हाथरस पहुंचना था। PFI से जुड़े दो लोग वहां जा रहे थे। वे भी उनके साथ कार में दिल्ली से निकल गए और साजिश का शिकार बन गए।

बिलकिस बानो का केस लड़ने वालीं एडवोकेट शोभा गुप्ता ने गैंगरेप के दोषियों की रिहाई को गलत बताया है। उनका कहना है कि कई लोग कह रहे हैं कि बिलकिस को सुरक्षा देनी चाहिए, लेकिन मेरा सवाल है कि बिलकिस की आजादी क्यों छीनी जाए? जब तक गुनहगारों की रिहाई कैंसिल नहीं होती, तब तक क्यों न उनके चारों तरफ 4-4 पुलिस वाले खड़े कर दिए जाएं। इससे वे लोग बिलकिस को नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे।

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