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Mahashivratri 2026 : ऐसा शिवलिंग जिसका हर साल बढ़ रहा आकार, अर्धनारीश्वर रूप में पूजते हैं श्रद्धालु

रायपुर. हिन्दू धर्म का विशेष पर्व महाशिवरात्रि आज श्रद्धा और उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जा रहा है. सुबह से शिवालयों में भक्तों का तांता लगा है. शिवभक्तों में महाशिवरात्रि को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है. ऐसा ही नजारा गरियाबंद के भुतेश्वरनाथ मंदिर में भी है. यहां प्रकृति प्रदत्त विश्व का सबसे विशाल शिवलिंग विराजमान है.

बढ़ता हुआ शिवलिंग, आस्था या चमत्कार?

भूतेश्वर नाथ महादेव के नाम से प्रसिद्ध इस प्रकृति प्रदत्त शिवलिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हर साल इसका आकार नित-नित बढ़ रहा है. ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं इस पावन धरा पर शिवलिंग के रूप मे विराजमान है.

विज्ञान के लिए रहस्य, भक्तों के लिए आस्था (Mahashivratri 2026)

शिवलिंग की यह खासियत भक्तों के लिए तो चमत्कार है, परंतु वैज्ञानिको के लिए शोध का विषय है. इस प्राकृतिक शिवलिंग की ऊचांई लगभग 18 फ़ीट व चौड़ाई (गोलाई) 20 फीट है. पुरातात्विक विभाग द्वारा प्रतिवर्ष इस शिवलिंग की जांच की जाती है. उनके अनुसार शिवलिंग प्रतिवर्ष 6 से 8 इंच तक बढ़ रही है.

भकुर्रा महादेव : नाम की ऐतिहासिक मान्यता

भूतेश्वर नाथ महादेव को भकुर्रा महादेव के नाम से भी जाना जाता है. छत्तीसगढ़ की भाषा में हुंकारना (आवाज़ देना) की ध्वनि को भकुर्रा कहा जाता है. इसलिए भूतेश्वर महादेव को भकुर्रा महादेव के नाम से भी पुकारा जाता है.

अर्धनारीश्वर रूप में पूजा जाने वाला शिवलिंग (Mahashivratri 2026)

भूतेश्वर नाथ महादेव के पीछे भगवान शिव की प्रतिमा स्थित है, जिसमें भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिक, नंदी के साथ विराजमान हैं. इस शिवलिंग मे हल्की सी दरार भी है, इसलिए इसे अर्धनारीश्वर के रूप मे पूजा जाता है. इस शिवलिंग का बढ़ता हुआ आकार आज भी शोध का विषय है.

शिवलिंग की उत्पत्ति से जुड़ी प्राचीन कथा

कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व जमींदारी प्रथा के समय गरियाबंद के पारागांव निवासी शोभा सिंह जमींदार यहां खेती करते थे. शाम को जब शोभा सिंह अपने खेत में जाती थी तो उसे खेत के पास एक विशेष आकृति से बैल की आवाज, बैल के चीखने की आवाज और शेर के दहाड़ने की आवाज सुनाई देती थी. यह बात उन्होंने ग्रामीणों को बताई. शाम को भी ग्रामीणों ने यही आवाज सुनी. बैल और शेर की तलाश की गई, लेकिन कोई जानवर न होने के कारण इस टीले की श्रद्धा और बढ़ गई. लोग इस टीले को शिवलिंग मानने लगे.

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