
श्रीमद भागवत कथा का विश्राम राजा परीक्षित के मोक्ष के प्रसंग के साथ हुआ सम्पन्न,
अंतिम दिवस पर सुदामा चरित्र व परीक्षित मोक्ष की कथा राष्ट्रीय संत श्री चिन्मयानन्द जी द्वारा,
कार्यक्रम के सफल संचालन के लिये कार्यकर्ताओं एवं विभिन्न संगठन के सदस्यों को आभार प्रगट करते हुए किया सम्म्मान,
भागवत कथा के अंतिम दिवस पर उनके ट्रस्ट के सदस्य एवं अन्य राज्य से उनके भक्त हुए सम्मिलित,
भटगांव : नगर के हित, युवाओं के प्रेरणा श्रोत एवं व्यापारी संघ के अध्यक्ष श्री प्रदीप देवांगन एवं केशव देवांगन के माताश्री स्व. मीना देवी के स्मृति व वार्षिक श्राद्ध मे आयोजित श्रीमद भागवत कथा का आज अंतिम दिवस पर सुदामा चरित्र व परीक्षित मोक्ष की कथा राष्ट्रीय संत श्री चिन्मयानन्द जी द्वारा संगीतमय ढंग से सुनाई गई।
कथा में भगवान कृष्ण की लीलाओ का भावपूर्ण वर्णन किया गया। जिसमें भजन’अरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो कि दर पे सुदामा गरीब आ गया है’पर भाव विभोर हो श्रोताओं की आंखों से अश्रुधार बही और कथा मे उनके चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि उज्जैन (अवंतिका) में स्थित ऋषि सांदीपनि के आश्रम में बचपन में भगवान श्रीकृष्ण और बलराम पढ़ते थे। वहां उनके कई मित्रों में से एक सुदामा भी थे। सुदामा के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। कहते हैं कि सुदामा जी शिक्षा और दीक्षा के बाद अपने ग्राम अस्मावतीपुर (वर्तमान पोरबन्दर) में भिक्षा मांगकर अपना जीवनयापन करते थे।
सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे। विवाह के बाद वे अपनी पत्नी सुशीला और बच्चों को बताते रहते थे कि मेरे मित्र द्वारिका के राजा श्रीकृष्ण है जो बहुत ही उदार और परोपकारी हैं।
यह सुनकर एक दिन उनकी पत्नी ने डरते हुए उनसे कहा कि यदि आपने मित्र साक्षात लक्ष्मीपति हैं और उदार हैं तो आप क्यों नहीं उनके पास जाते हैं। वे निश्चित ही आपको प्रचूर धन देंगे जिससे हमारी कष्टमय गृहस्थी में थोड़ा बहुत तो सुख आ जाएगा।
सुदामा संकोचवश पहले तो बहुत मना करते रहे लेकिन पत्नी के आग्रह पर एक दिन वे कई दिनों की यात्रा करके द्वारिका पहुंच गए। द्वारिका में द्वारपाल ने उन्हें रोका। मात्र एक ही फटे हुए वस्त्र को लपेट गरीब ब्राह्मण जानकर द्वारपाल ने उसे प्रणाम कर यहां आने का आशय पूछा। जब सुदामा ने द्वारपाल को बताया कि मैं श्रीकृष्ण को मित्र हूं दो द्वारपाल को आश्चर्य हुआ। फिर भी उसने नियमानुसर सुदामा जी को वहीं ठहरने का कहा और खुद महल में गया और श्रीकृष्ण से कहा, हे प्रभु को फटेहाल दीन और दुर्बल ब्राह्मण आपसे मिलना चाहता है जो आपको अपना मित्र बताकर अपना नाम सुदामा बतलाता है। जहां नंगे पाँव श्रीकृष्ण दौड़ते हुए उनके मित्र के पास पहुंचते है और उन्हें अपने गले से लगा लेते हैं।
नगर पंचायत भटगांव के दुर्गा मंदिर चौक में चल रही सात दिवसीय श्रीमद भागवत कथा में आज की कथा मे राष्ट्रीय संत श्री चिन्मयानन्द जी ने श्रीमद भागवत कथा का विश्राम राजा परीक्षित के मोक्ष के प्रसंग के साथ किये । कहा कि – राजा परीक्षित ने सात दिन तक मन से कथा श्रवण किया। परीक्षित को ऋषि के श्राप के कारण तक्षक नाग ने काटा और उनके जीवन का अंत हो गया। कथा के प्रभाव से उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ और नाम अजर-अमर हो गया।
वहीं बापू जी ने कहा कि कथा के श्रवण प्रवचन करने से जन्मजन्मांतरों के पापों का नाश होता है और विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। कथा में प्रवचन देते हुए कहा कि संसार में मनुष्य को सदा अच्छे कर्म करना चाहिए, तभी उसका कल्याण संभव है। माता-पिता के संस्कार ही संतान में जाते हैं। संस्कार ही मनुष्य को महानता की ओर ले जाते हैं। श्रेष्ठ कर्म से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। अहंकार मनुष्य में ईष्र्या पैदा कर अंधकार की ओर ले जाता है। व्यक्ति थोड़े ही धन प्राप्त कर अपने आप को धनी समझने लगता है और अहंकार पूर्ण कार्य करते हुए अपने आप को अंतिम मे नष्ट कर डालता है जहाँ उसका कमाया हुआ धन किसी काम का नहीं आता है। मनुष्य को सदा सतकर्म करना चाहिए। उसे फल की चिंता ईश्वर पर छोड़ देनी चाहिए।
वहीं कार्यक्रम के सफल संचालन के लिये कार्यकर्ताओं, देवांगन समाज के सदस्यों एवं विभिन्न संगठन के सदस्यों का आभार प्रगट करते हुए सम्मानित किये तथा ट्रस्ट मे दान देने वाले सभी भक्तों व श्रद्धालुओं को बापू जी द्वारा शुभकामनायें व आशीर्वाद प्रदान करते हुए श्रीकृष्ण व राधारानी से उनके मंगलमय जीवन,अच्छे स्वास्थ्य व समृद्धि के लिये प्रार्थना किये।
आज अंतिम दिवस पर हजारों की संख्या मे भक्तों ने पंडाल पहुंचकर श्रीमद भागवत कथा सुने एवं देवांगन धर्मशाला मे भोजन आदि प्रसाद ग्रहण किये. वहीं कल दिनांक 13 दिसंबर को स्व. श्रीमती मीना देवी देवांगन का वार्षिक श्राद्ध एवं महा भंडारा का आयोजन किया गया है.









