हमेशा श्रेष्ठ कर्म करें–देवकुमारी देवीजी स्वार्थ पूर्ति हेतु असत्य का सहारा न लें, परिणाम अंततः दुखदायी होता है –देवकुमारी देवीजी


हमेशा श्रेष्ठ कर्म करें–देवकुमारी देवीजी
स्वार्थ पूर्ति हेतु असत्य का सहारा न लें, परिणाम अंततः दुखदायी होता है –देवकुमारी देवीजी
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बिलाईगढ——- -विकासखण्ड बिलाईगढ के ग्राम धनसीर में स्थित जय सिद्ध बाबा शक्ति पीठ शिवडोंगरी में संगीतमयी शिवपुराण कथा यज्ञ का आयोजन किया गया है। यह आयोजन ब्रम्हचारी रामेश्वर चैतन्य जी महाराज एवं ग्रामवासियों के द्वारा विश्वकल्याण हेतु किया गया है। चंडीधाम नरियरा// हसौद// से आई हुई सुश्री देवकुमारी देवीजी व्यासासीन होकर अपनी मधुर सरस ओजमयी वाणी में कथा का गुणगान कर रही हैं। भगवान शिवजी की महिमा का गुणगान करती हुई बताई कि, मनुष्य को यह मानव देह भगवान शिवजी की कृपा से अपना कल्याण करने के लिए मिला है। इसलिए हमेशा मनुष्य को श्रेष्ठ कर्मों को करना चाहिए ।मानव देह प्राप्त करके जो देश समाज के हित के लिए कार्य नहीं करता उसका जीवन कबाड़ के समान है। जिसका कोई महत्व नहीं है। अपने और अपनों के लिए तो चींटी से लेकर हाथी तक सभी करते हैं। मनुष्य भी जीवन भर यही करता रहा तो फिर मानव देह की क्या सार्थकता है। वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो मानव देह पाकर पर हित के लिए भी कुछ करते रहता है। श्री रामचरितमानस में प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि, काहु न कोउ सुख-दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सब भ्राता।। पर हित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।

आगे देवीजी ने कथा सुनाती हुई बताई कि, एक बार शेषसायी भगवान विष्णु अपनी शक्ति लक्ष्मीजी तथा अन्य पार्षदों के साथ शयन कर रहे थे। उसी समय ब्रह्मा अपनी इच्छा से वहां पहुंचकर विष्णुजी से पूछा कि तुम कौन हो जो मुझे देखकर भी उद्धत पुरुष के समान सो रहे हो। भगवान विष्णुजी बोले की हे वत्स तुम्हारा कल्याण हो। आओ आसन पर बैठो। ब्रह्मा बोला- हेविष्णु काल के प्रभाव से तुम्हें बहुत अभिमान हो गया है। हे वत्स मैं जगत पितामह और तुम्हारा रक्षक हूं। विष्णुजी बोले हे वत्स यह जगत मुझमें ही स्थित है। तुम व्यर्थ ही दूसरे की संपत्ति को अपना मानते हो ।तुम मेरे नाभि कमल से उत्पन्न हो ।अतः तुम मेरे पुत्र हो। इस प्रकार दोनों ब्रह्मा एवं विष्णु युद्ध करने लगे ।तब निराकार भगवान शंकर विशाल अग्नि स्तंभ के रूप में उन दोनों के मध्य प्रकट हो गए ।विशाल अग्नि स्तंभ को देखकर ब्रह्मा और विष्णुजी आश्चर्यचकित होकर गउसकी ऊंचाई एवं जड़ को हम दोनों जांच करेंगे। ऐसा निश्चय कर विष्णुजी सूकर का रूप धारण कर जड़ की खोज में चले एवं ब्रह्मा हंस का रूप धारण करके उसका अंत खोजने के लिए चल पड़े। विष्णुजी पाताल लोक तक जाने पर भी उसका अंत नहीं मिलने से रणभूमि में वापस आ गए। आकाश मार्ग से जाते हुए ब्रह्मा ने मार्ग में अद्भुत केतकी के पुष्प को गिरते देखा। ब्रह्मा ने पूछा हे पुष्पराज तुम्हें किसने धारण कर रखा था और तुम क्यों गिर रहे हो। केतकी ने कहा कि इस पुरातन और अप्रमेय स्तंभ के बीच से मैं बहुत समय से गिर रहा हूं, फिर भी इसके आदि का पता नहीं चल पाया। अतः आप भी स्तंभ का अंत देखने की आशा को छोड़ दो। ब्रह्मा बोले मैं तो हंस का रूप धारण कर इस स्तंभ का अंत देखने यहां आया हूं। अब हे मित्र तुम मेरा एक काम कर दो। मेरे साथ विष्णुजी के पास चलकर झूठ बोल दो कि यह स्तंभ के अंत को देख लिए हैं। मैं ब्रह्मा तुम्हें फूलों में सुंदर सुगंधित बना दूंगा। केतकी प्रलोभन में आकर ब्रह्मा के साथ विष्णु के पास रणभूमी में आई। ब्रह्मा बोले मैं स्तंभ के अग्रभाग को देख लिया हूं।
यह केतकी मेरा गवाह है। उसी समय स्तंभ प्रज्वलित लिंग से महेश्वर प्रगट हो गए। परमेश्वर को प्रकट देखकर विष्णुजी चरण पकड़ कर बोले कि आप आदि अंत रहित है ।मैं आपके आदि अंत को नहीं जान पाया। परमेश्वर बोले मैं तुम पर अति प्रसन्न हूं। तुमने सत्य वचन का पालन किया, इसलिए आज से तुम्हें सत्यनारायण नाम से जाना जाएगा एवं तुम्हारा कथा व पूजन होगा। इसके बाद शिवजी ने ब्रह्मा के घमंड को मिटाने के लिए अपनी भृकुटी के मध्य से भैरव को उत्पन्न किया और आदेश दिया कि अपनी तीक्ष्ण तलवार से इसका वध कर दो। तब भैरव ने एक हाथ से ब्रह्मा के केस को पकड़कर असत्य भाषण करने वाले उसके पांचवें सिर काटकर हाथों से तलवार भांजते हुए उन्हें मार डालने को उद्यत हुए। तब ब्रह्मा ने भैरव के चरणों में गिरकर झूठ बोलने की गलती स्वीकार कर क्षमा मांगने लगा। ब्रह्मा के रक्षा के लिए विष्णुजी भी शंकर जी के चरण कमल में गिरकर ब्रह्माजी के ऊपर दया करने के लिए विनती करने लगे शिवजी ने एक सर से विहीन ब्रह्मा से कहा तुम श्रेष्ठता पाने के चक्कर में झूठ का सहारा ले रहे थे इसलिए संसार में तुम्हारा सत्कार नहीं होगा। तुम्हारे मंदिर तथा पूजन उत्सव आदि नहीं होंगे। झूठी गवाही देने वाले कपटी केतक से शिवजी ने कहा तुम दुष्ट हो, यहां से दूर चले जाओ ।मेरी पूजा में तुम्हारा फुल मुझे प्रिय नहीं होगा ।इस तरह तात्कालिक लाभ या स्वार्थ पूर्ति हेतु असत्य भाषण करने का परिणाम अंततः दुखदाई होता है। इसलिए झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए। समाज में सम्मान पाने के लिए अपने नियत कर्तव्य कर्मों को करते हुए उपलब्ध 24 घंटे का सदुपयोग करना चाहिए।
अपना एक लक्ष्य निर्धारित कर शरीर स्वास्थ्य को ठीक रखते हुए नियमित लगन के साथ कठिन परिश्रम करने से व्यक्ति को लक्ष्य की प्राप्ति होती है। लक्ष्य मिलने से व्यक्ति का समाज में सम्मान होता है। इसलिये हमेशा उन्नति के लिए कठिन परिश्रम एवं सत्य का सहारा लेना चाहिए ।
यह कथा 8 मार्च तक दोपहर 2:00 बजे से प्रारंभ होकर शिवजी की इच्छा तक होगी ।9 मार्च को हवन, सहस्त्रधारा, प्रसाद वितरण होगा। कथा श्रोताओं के लिए आयोजक एवं ग्राम वासियों के द्वारा भोजन भंडारा का व्यवस्था किया गया है। कथा आयोजक ब्रह्मचारी रामेश्वर चैतन्य जी महाराज, कथा वाचिका देवकुमारी देवीजी एवं ग्रामवासियों ने अधिक से अधिक लोगों को आकर इस कथा का लाभ उठाने के लिए निवेदन किए हैं।




