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सीएमएचओ डॉ निराला ने शिक्षिकों को कृमिरोधक और आयरन गोली को खिलाने का दिया प्रशिक्षण

डॉ निराला ने शिशु, किशोर, महिला और पुरुषों को होने वाले बीमारियों की दी जानकारी

सीएमएचओ डॉ निराला ने शिक्षिकों को कृमिरोधक और आयरन गोली को खिलाने का दिया प्रशिक्षण

डॉ निराला ने शिशु, किशोर, महिला और पुरुषों को होने वाले बीमारियों की दी जानकारी

सारंगढ़-बिलाईगढ़ :  कलेक्टर डॉ संजय कन्नौजे के निर्देशानुसार जिले को एनीमियामुक्त करने के लिए अभियान चलाई जा रही है।स्वामी आत्मानंद स्कूल सरसीवां में आयोजित 5 दिवसीय एफएलएन आधारित नवीन पाठ्यपुस्तक प्रशिक्षण में जहां 65 शिक्षकों की प्रशिक्षण चल रही है, वहां जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ एफ आर निराला ने पहुंच कर सभी शिक्षकों को आयरनयुक्त, एनीमिया मुक्त के बारे में विस्तार से बताया। बच्चों को एनीमियायाने रक्त अल्पता (खून की कमी) होने से बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है, इससे स्कूल की उपस्थिति से साथ वार्षिक रिजल्ट पर भी प्रभाव पड़ता है।

भारत सरकार की एक सर्वे रिपोर्ट एनएफएचएस 5 के अनुसार 6 माह से 5 वर्ष के बच्चों में खून की कमी की दर 67% है। 6 वर्ष से 9 वर्ष तक के बच्चे में खून की कमी की दर लगभग 60% है। वैसे ही 10 वर्ष से 19 वर्ष के बालिकाओं में एनीमिया की दर 61.4% है। आंगनबाड़ी एवं स्कूल के छात्र, छात्राओं में खून की कमी बचपना में होने से शरीर में 4 प्रकार के प्रभाव डालता है। जैसे आईक्यू (दिमाग) में 5 से 10 % की कमी का होना, सीखने एवं समझने में कमी होना, शारीरिक एवं मानसिक विकास बाधित होना, एकाग्रता में कमी।

बच्चों की शरीर में प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण बच्चो की उपस्थिति, उनके रिजल्ट के साथ बार बार बीमार होना, खेलने में जल्दी थक जाना, पढ़ाई में मन नहीं लगना, पढ़ाई करने से याद नहीं हो पाना अर्थात बच्चे शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं रहता, जिसका प्रभाव स्कूल पर पड़ता है। बच्चे चंचल रहे पढ़ाई में अच्छे हो। खेलकूद में अच्छे स्वस्थ रहे, इसके लिए शासन ने व्यवस्था बनाई है। जैसे 6 माह से 5 वर्ष के बच्चे आंगनबाड़ी केंद्रों के होते हैं, उनके लिए आयरन की सिरप की व्यवस्था है, जिसे हर 6 माह में एक एक सिरप हर बच्चे को दी जाती है। बच्चे के पालक के माध्यम से प्रति सप्ताह मंगलवार और शुक्रवार के दिन एक एक एमएल आयरन सिरप की पिलाई जानी है और यह क्रम 5 वर्ष के उम्र तक जारी रहनी चाहिए। मितानिन को भी निर्देश दिए गए है कि वे बच्चों के घर तक जाकर पता करे कि पालक इस दवाई को पिला रहे है कि नहीं।

दूसरे कैटिगरी में 6 वर्ष से 9 वर्ष तक के बच्चे जो प्राइमरी स्कूल में होते हैं, इनको एनीमिया मुक्ति के लिए पिंक याने गुलाबी रंग की आयरन की गोली जिसे जूनियर वाईफस (वीकली आयरन एंड फोलिक एसिड सप्लिमेंटेशन) कहते हैं, को प्रति मंगलवार को मिड डे मील के बाद दी जाती है। शिक्षक सुनिश्चित करे कि, इस गोली को खाना खाने के बाद ही दे और पानी अच्छे से पिला दे।बच्चों के लिए यह गोली सुरक्षित है और एक रजिस्टर में संबंधित स्कूल के नोडल शिक्षक मंगलवार के हिसाब से अटेंडेंस शीट बना ले।

बच्चों को मोटिवेट करने के लिए प्रत्येक नोडल शिक्षक भी खा सकता हैं। इस तरह से 10 वर्ष से 19 वर्ष ( किशोर अवस्था) में आयरन की ज्यादा जरूरत पड़ती है, क्योंकि बालिकाओं में मासिक धर्म चालू हो जाता है। इसके अलावा 19 वर्ष के ऊपर गर्भवती माता , पोषक माता या फिर जो गर्भवती नहीं है पोषक माता नहीं है, लेकिन 19 वर्ष से 49 वर्ष के उम्र के महिला है, उनको भी लाल रंग की आयरन गोली दी जाती है। खून की कमी को दूर करने के लिए यह गोली पुरुषों को भी दी जाती है। इस आयरनयुक्त, एनीमियामुक्त के इस मुहिम में शिक्षकों की योगदान बहुत है। अगर स्कूल स्तर पर बच्चों के हित में प्रति सप्ताह आयरन की गुलाबी गोली ( प्राथमिक शालाओं तक) खिलाते तब बच्चों की नींव मजबूत होगी और आगे राष्ट्र निर्माण में उनकी योगदान मिलेगी। बच्चों में एनीमिया मुक्त अभियान के लिए संतुलित आहार भी जरूरी है। बच्चों की एक्टिविटी के हिसाब से एक निश्चित मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होती है, जिसे उनके खानपान से पूर्ति की जाती है इसलिए उनके खाने में निम्न अवयव जरूर शामिल हो जैसे प्रोटीन,कार्बोहाइड्रेट,वसा, सूक्ष्म लवण, विटामिन और पानी की पर्याप्त मात्रा बच्चों के भोजन में होना चाहिए, लेकिन आजकल के जीवन शैली में बच्चों की खाने के समान में अवयव की कमी देखी जा रही है। इसके लिए पालकों को भी ध्यान देने होंगे और यही से रक्त अल्पता की कमी होना प्रारंभ हो जाता है। बच्चों में खून की कमी के लिए एक बड़ा कारण बचपन से कृमि रोग का होना होता है। छोटे बच्चे नंगे पैर जमीन में घर आंगन में मिट्टी में खेलते है और जमीन में कृमि होता है, जो नग्न आंखों से दिखाई नहीं देता, पैर से प्रवेश करता है।कुछ कृमि हमारे भोज्य पदार्श के साथ मुंह के माध्यम से प्रवेश करता है। अंततः कृमि बच्चों के अंतड़ियों में अपना निवास बनाता है। कृमि को जिंदा रहने के लिए अपनी संख्या को बढ़ाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है जिसे बच्चे द्वारा खाए गए खाना के पौष्टिक तत्व को कृमि खा लेता है एवं बच्चे के खून को भी चूसता है परिणाम बच्चे की हीमोग्लोबिन कम होते जाता है। रक्त अल्पता होते जाता है, कम हीमोग्लोबिन होने के कारण शरीर के विभिन्न हिस्सों में ऑक्सीजन कम पहुंचती है। इसके कारण बच्चो में जल्दी थकान होने लगता है। मन थकता है शरीर थकता है और 4 प्रकार के प्रभाव शरीर में पड़ता है।

शासन ने व्यवस्था बनाई है कि प्रतिवर्ष 10 अगस्त को एवं 10 फरवरी को प्रत्येक बच्चे को कृमि नाशक गोली खिलानी है। बच्चों में एनीमिया के एक और बड़ा कारण है सिकलसेल की बीमारी जिसके लिए सभी बच्चों की सिकलसेल की जांच की गई है,उनको जो सिकलसेल की बीमारी से पीड़ित है। दवाइयां उपलब्ध कराई गई है। इसे भी खिलाना जरूरी होता है। इस प्रशिक्षण में मुख्य रूप से अमित कुमार व प्रशांत केशरवानी, चैतन्य कुमार, छाया, मनीष, कार्तिकेश्वर, घनश्याम, शोभाराम, ओमप्रकाश, सुनीता, भागवत, नंदा, दिव्या, हेमंत व सीमा (सभी साहू) रामाधीन जायसवाल, दिनेशकुमार खूंटे, ममता राय, आशा बघेल, इंदु दीवान, अनुसुइया चौधरी, मीणा नेताम, अनीता भास्कर , निर्मला व वृंदा मानिकपुरी, विनय भूषण आदि उपस्थित रहे।

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