देखिये मंत्री जी….आपके जिले में पंडो आदिवासियों की दुर्दशा ! सरकारी सिस्टम और भ्रष्ट अफसरों की पोल खोलती है ये खबर….
सरकार ने इन पंडो आदिवासियों की दुर्दशा पर न ध्यान दिया गया और ना ही मौजूदा सरकार के मंत्री और सरकारी अफसर इस ओर ध्यान दे रहे है।

देखिये मंत्री जी….आपके जिले में पंडो आदिवासियों की दुर्दशा ! सरकारी सिस्टम और भ्रष्ट अफसरों की पोल खोलती है ये खबर….

सरकार ने इन पंडो आदिवासियों की दुर्दशा पर न ध्यान दिया गया और ना ही मौजूदा सरकार के मंत्री और सरकारी अफसर इस ओर ध्यान दे रहे है।
कोरबा : छत्तीसगढ़ राज्य अपने गठन का 25 वर्ष पूरा होने पर रजत महोत्सव मना रहा है। राज्य गठन के इन 25 सालों में प्रदेश ने खूब तरक्की और विकास किया। लेकिन इसी आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ में आज 25 साल बाद भी वनांचल में रहने वाले संरक्षित आदिवासी जंगली जीवन जीने को मजबूर है। केंद्र और राज्य सरकार भले ही इनके विकास और उत्थान के लिए कई योजनाएं चला रही है। लेकिन सरकारी सिस्टम ने आज तक इन आदिवासियों के उत्थान की दिशा में मुकम्मल कोशिश नही की। नतीजा आदिवासी बाहुल्य कोरबा जिले में आज भी पंडो आदिवासियों की दुर्दशा सरकारी सिस्टम की नीयत और नीतियों पर सवाल उठा रही है।

छत्तीसगढ़……एक आदिवासी बाहुल्य राज्य है। 1 नवंबर 2020 को जब अविभाजित मध्य प्रदेश से अलग होकर इस राज्य का गठन किया गया, तब पहले मुख्यमंत्री के तौर पर स्व.अजीत जोगी ने मुख्यमंत्री की शपथ ली थी। प्रदेश गठन के साथ ही छत्तीसगढ़ में आदिवासी नेतृत्व की मांगे उठने लगी थी। लेकिन इसी आदिवासी बाहुल्य राज्य में आदिवासियों के उत्थान को लेकर आज 25 साल बाद भी सरकारी सिस्टम और हमारे राजनेता उदासीन नजर आ रहे है। हम बात कर रहे है कोरबा जिला की, जहां से सरकार के उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन आते है, और सरकार के डिप्टी सीएम अरूण साव इस जिले के प्रभारी मंत्री है। बाजवूद इसके जिले के पोड़ी-उपरोड़ा ब्लाॅक में रहने वाले पंडो आदिवासी नारकीय जीवन जीने को मजबूर है। यहां के केंदई पारा में रहने वाले पंडो आदिवासियों की बस्ती में आज भी सरकारी योजनाओं का इंतजार है।

ग्राउंड जीरों पर जाकर जब हकीकत जानने की कोशिश की, तो पता चला कि ये पूरा गांव एसईसीएल की विजय वेस्ट भूमिगत खदान से प्रभावित है। एसईसीएल प्रबंधन ने इस गांव के साथ ही आसपास के दूसरे अन्य गांवों को कागजों में गोद ले रखा है, लेकिन आज तक इस गांव में सामुदायिक विकास के नाम पर महज एक सामुदायिक भवन बनाने के अलावा कोई काम नही कराया गया। वहीं एसईसीएल प्रबंधन इन प्रभावित गांव की जगह CSR मद से होने वाले विकास कार्य पड़ोसी जिला मनेंद्रगढ़-चिरमिरी में कराकर मनमानी कर रहा है। ये समस्या आज की नही है सालों-साल से चलती आ रही है। बावजूद इसके ना तो पहले की सरकार ने इन पंडो आदिवासियों की दुर्दशा पर ध्यान दिया गया और ना ही मौजूदा सरकार के मंत्री और सरकारी अफसर इस ओर ध्यान दे रहे है।

कागजों में पूरा कर दिये सरकारी योजनाओं के काम
कोरबा के केंदई पारा में रहने वाले पंडो आदिवासियों को आज भी सरकारी योजना के नाम पर केवल महतारी वंदन और सोसायटी से मिलने वाला राशन का लाभ मिल रहा है। छत्तीसगढ़ के साथ ही कोरबा जिला सालों पहले ओडीएफ हो गया, लेकिन हाथी प्रभावित इस गांव में आज भी पंडो परिवार के घरों में शौचालय का काम पूरा नही हो सका है। लिहाजा गांव के बड़े-बच्चे और महिलाएं आज भी खुले में शौच करने के लिए मजबूर है। जल जीवन मिशन योजना के तहत गांव में आधे-अधूरे कनेक्शन किये गये, जिसमें आज भी पानी की सप्लाई सिर्फ कागजों में ही की जा रही है। लिहाजा आज भी इस गांव के पंडो आदिवासी डबरी और कोयला खदान से निकलने वाले दूषित काला पानी पीने को मजबूर है। गांव में किसी भी परिवार को उज्जवला योजना का लाभ आज तक नही मिल सका है, लिहाजा ये पंडो आदिवासी आज भी जंगल की लकड़ियों से धुंए के बीच अपना भोजन पकाने को मजबूर है।

SECL की मनमानी पर उद्योग मंत्री और डिप्टी सीएम ने क्यों साध रखी है चुप्पी ?
कोरबा के केंदई पारा में व्याप्त समस्या महज एक उदाहरण है, वनांचल में रहने वाले अधिकांश पंडो आदिवासी व दूसरे संरक्षित जनजाति परिवारों की कहानी कुछ ऐसी ही है। सरकार और सरकारी उपक्रम इनके विकास के लिए दावे तो करते है, लेकिन ये दावे धरातल पर दूर-दूर तक नजर नही आते ? ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यहीं है कि क्या एसईसीएल की वादाखिलाफी और सीएसआर मद का प्रभावित गांव की जगह पड़ोसी जिले में व्यय को लेकर उद्योग मंत्री या फिर डिप्टी सीएम कोई पहल करेंगे ? आखिर जिला प्रशासन ने एसईसीएल खदान से प्रभावित इन पंडो आदिवासियों केउत्थान और उनके अधिकार की दिशा में आज तक कोई पहल क्यों नही किया गया ?
सवाल ये भी है कि क्या ये भोले-भाले संरक्षित आदिवासी केवल चुनाव के वक्त में ही याद किये जाते रहेंगे ? ऐसा भी नही है कि ये संभव नही है, सरकार और सरकारी सिस्टम चाहे तो सब संभव है, बशर्ते नीयत साफ और नीतियां जमीन पर उतरे…..।









